गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

लुप्तप्राय भाषाओँ के कगार पर भोजपुरी भाषा

जईसन की लागता, भोजपुरी जईसन महत्वपूर्ण भाषा भी अब लुप्तप्राय भाषा, जैसे की-- प्राकृत, पाली, कैथी जईसन लुप्तप्राय भाषा के कगार पर पहुंचे के स्थिति में आ गईल बा। अगर ऐसन स्थिति वास्तव में आ चुकल बा ता एकरा खातिर जिम्मेवार और केहू दोसर नईखे बल्की भोजपुरिया लोग ही बारन। काहे की कोई भी भाषा के उत्थान और पतन के जिम्मेवार ओह भाषा के उपयोग करे वाला लोग ही होखे ला। हम समझ सकीला की अपनी सभी के हमार बात कुछ अजीब लागत होई। लेकिन अगर हमार विचार के भावना और उद्देश के समझे के कोशिश करीं त अपनाहू यह बात से सहमत हो सकीला की भोजपुरी भाषा के उपयोग करेवाला लोग भोजपुरी बोले और लिखे में अपना के हीन समझे लन और राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के प्रयोग करे लन। ई बात नईखे की छेत्रिय भाषा भोजपुरी के प्रतियोगिता राष्ट्रीय भाषा हिन्दी से ह। देखीं भोजपुरी मातृभाषा ह और हिन्दी राष्ट्रीय भाषा ई दुनो भाषा के तालमेल ओइसने ह जैसे आपन घर और समाज। आपन घर में भी जब समाज के हस्तछेप शुरू हो जाई त घर के महत्व घर के रूप में न रह जाई। ओसहि अगर घर समाज पर वर्चस्व बनावल चाही त समाज के भी काम करे में परेशानी होई। एहसे ई आवश्यक बा की मातृभाषा एवं राष्ट्रीय भाषा दुनो के महत्व समझल जाओ और आपन मातृभाषा के ज्यादा से ज्यादा प्रयोग बिना हीच-किचाहत के प्रयोग करल जाओ। जे से की अगिला पीढी तक ई भाषा आगे जा सके और अगिला पीढी भी भोजपुरी साहित्य, भाषा, संस्कार, संस्कृति और महत्व के समझ कर उपयोग कर सके अऊर येही तरह यह भाषा के उपस्थिति हमेशा कई-कई पीढी में बनल रहे।
दोसर पीडा यह बात के ह की, यह भाषा के व्याकरण अऊर शब्दलिपि के निर्माण के तरफ़ ना ता भोजपुरिया लोग के ध्यान जाता और न यह बात के संभवतः गंभीरता से लेल जाता। काहे की कोई भी भाषा बिना व्याकरण आ शब्दलिपि के अधूरा ह काहे की व्याकरण और शब्दलिपि से कोई भी भाषा के समानता मिलेला। जहाँ तक भोजपुरी के सवाल बा, ई भाषा बिहार और उतरप्रदेश के विभिन्न छेत्र में विभिन्न तरह से बोलल जाला। जईसन की कहल बा, बोली पाँच कोस पर बदल जा ले ओसहिं भोजपुरी बोले के तरीका भी पाँच कोस पर बदल जाता। एह से समस्या ई बात के हो जाता की बोली में समानता नईखे और जब तक बोली में समानता ना होई, तब तक भोजपुरी साहित्य और लोकगीत में भी समानता न हो सकी आ एकर प्रभाव शब्दार्थ पर पड़ी। येही से हमार चिंता भोजपुरी व्याकरण और शब्दावली के विषय में ज्यादा ह। अगर एकरा विषय में कौनो ठोस और कारगर कदम जल्दी से जल्दी ना उठावल गईल ता आगे बड़ा परेशानी होई काहे की व्याकरण और शब्दावली के निर्माण खातिर भोजपुरी परीछेत्र के सभी बुजुर्ग साहित्यकार अब काफ़ी बुजुर्ग हो चुकल बारें और उनके मार्ग-दर्शन पर ई महत्वपूर्ण काम हो सकेला। साथ ही एह काम खातिर समस्त भोजपुरी परीछेत्र के एक-जुट होवे के परी ताकि अपना अपना परीछेत्र में बोलल जाए वाला शब्द के उनका द्वारा आम सहमती से शब्दावली में उल्लेखित करावल जाओ। लेकिन ई काम हमनी के धरोहर (बुजुर्ग) के रहते कर दिहल जाओ ता सार्थक बा ना ता ओकरा बाद ता ई महत्वपूर्ण काम अधूरे रह जाई।
देखीं भोजपुरी के जागरूकता खातिर मीडिया के पहल सराहनीय बा काहे की महुआ चैनल जवान आधुनिकता और बढ़िया प्रोग्राम देखाव्ता उ प्रोग्राम कतहूँ से और हिन्दी चैनल के प्रोग्राम से कम नईखे। एकरा खातिर महुआ चैनल के भोजपुरी समाज के तरफ़ से लाख-लाख बधाई और साधुवाद देल चाहब। लेकिन महुआ चैनल के मध्यम से अगर भोजपुरी साहित्य से जुरल नाट्य प्रस्तुति जैसे भिखारी ठाकुर जी के नाटक इत्यादि प्रस्तुत कराल जाओ ता भोजपुरी के लुप्तप्राय नाट्य प्रस्तुति के भी जीवंत कराल जा सकेला। देखीं, लिखते लिखत मन के एक और दर्द बाहर आवल चाहता की आजकल कुछ भोजपुरी लोकगीत कलाकारन के द्वारा भोंडा और अश्लील गीत के भोजपुरी लोकगीत के नाम पर कैसेट और मीडिया के मध्यम से प्रस्तुत कराल जाता। ये तरह के गीत से भी भोजपुरी शर्मनाक होत जाता। लोग यह गीत संगीत के साथ भोजपुरी के आगे नइखन बढ़ावत बल्कि भोजपुरी के कीचड़ में लपेट कर गन्दा कर तारे और भोजपुरी के प्रति चिंतित और जागरूक भोजपुरिया समाज के ऐसन गीत और कार्यक्रम के बहिष्कार कराल जरूरी भी बा।
देखीं, अगर भोजपुरिया समाज भोजपुरी के मातृभाषा के रूप में सहर्ष स्वीकार करते हुए अगीला पीढी में ना ले जाई और ई भाषा के साथ भावनात्मक रूप से न जुड़ी तब तक भोजपुरी भाषा के उत्थान न होत सकेला। जरूरत बा एक वैचारिक आन्दोलन के और सामाजिक जागरूकता के की -- "गर्व से कहीं, हम भोजपुरिया हईं"। अगर ई भाषा अगीला पीढी में ना जा सकल ता जान जाईं की अगीला पीढी हमनी के कई संस्कार से वंचित रह जाई। अब तनी सोचिना की "कांच ही बांस के बहन्गीय, बहंगी लटकत जाए, बहंगी लटकत जाए" के गीत के बिना छठ पुरा होत जाई ? बिआह करे जाए वाला दूल्हा के नजर कैसे उतरल जाई जब ई गीत गावे वाला ही ना रही-- "जे हमरा बाबू के नजर लगायीहें उनका के कानी गदही चढैबो"। होली में ढोलक के थाप पर ई होरी गावे वाला के रही - "सरजू तट राम खेलस होरी, सरजू तट"। वसंत के फगुनाहट में दूर चौर में भैंस चरावत चरवाहा के गला से ई गीत कैसे सुनी के मिली - "राम जी दुल्ह्वा से, पूछली नौनिया, बबुआ बोला ना, के हवे तोहर माई बाप, बबुआ बोला ना।" आ ई गीत भी ता न मदमा सकी रात में सजवा पर सुतल नव्की दुलहिनिया के - "आधी आधी रतिया के बोले ली कोयारिया, चिहुक उठे गोरिया, सेजरिया से काहे, चिहुक उठे गोरिया, सेजरिया से काहे"।